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Sunday, 25 January 2026

 

हम किस तरह का गणतंत्र बनते जा रहे हैं?

गणतंत्र दिवस विशेष | जनता के नाम संदेश

हर गणतंत्र आशा से जन्म लेता है।

लेकिन उसका भविष्य घोषणाओं से नहीं, रोज़मर्रा के आचरण से तय होता है।

गणतंत्र का मूल्यांकन भाषणों से नहीं, व्यवहार से होता है।

क्या हम अधिक सहिष्णु बन रहे हैं, या अधिक अधीर?

क्या हम असहमति को संवाद मानते हैं, या दुश्मनी?

प्रगति केवल सड़कों और इमारतों से नहीं मापी जाती।

वह नैतिक परिपक्वता से भी आँकी जाती है।

जब आलोचना को देशद्रोह समझा जाने लगे, तब गणतंत्र भीतर से कमजोर होता है।

और जब प्रश्न पूछने वाले डरने लगें, तब स्वतंत्रता अर्थ खो देती है।

लोकतंत्र पूर्णता नहीं मांगता।

वह ईमानदारी और सुधार की इच्छा मांगता है।

हम जैसा सोचते हैं, जैसा बोलते हैं, और जैसा सहते हैं —

वही गणतंत्र हम बनाते हैं।

गणतंत्र एक दर्पण है— उसमें वही दिखता है जो हम स्वयं होते हैं।

— 26 जनवरी विशेष | जनता के नाम संदेश

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