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Sunday, 25 January 2026

 

भ्रष्टाचार और मौन नागरिक

गणतंत्र दिवस विशेष | जनता के नाम संदेश

भ्रष्टाचार की चर्चा होते ही उँगलियाँ अक्सर नेताओं, अधिकारियों, और संस्थाओं की ओर उठती हैं।

यह आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं।

भ्रष्टाचार अकेले नहीं फलता।

वह मौन से पोषित होता है।

छोटी-छोटी सहूलियतें, नियमों की अनदेखी, “चलता है” का रवैया —

यही वे बीज हैं जिनसे बड़ा भ्रष्टाचार जन्म लेता है।

हर भ्रष्ट व्यवस्था अपराधियों से नहीं बनती।

कई बार वह ईमानदार लोगों की चुप्पी से टिकती है।

मौन अक्सर सुरक्षित लगता है।

लेकिन यही मौन अन्याय को सामान्य बना देता है।

गणतंत्र केवल भ्रष्टाचार से नहीं, उसे स्वीकार कर लेने से कमजोर होता है।

भ्रष्टाचार से लड़ना हमेशा आंदोलन नहीं मांगता।

यह ईमानदारी, अस्वीकार, और नैतिक साहस से शुरू होता है।

जवाबदेही कार्यालयों से पहले अंतरात्मा में जन्म लेती है।

मौन भ्रष्टाचार को बढ़ाता है, साहस गणतंत्र को बचाता है।

— 26 जनवरी विशेष | जनता के नाम संदेश

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