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Friday, 20 February 2026

 

 केशवानंद भारती मामला – न्यायिक विकास

Page 2 – गोलकनाथ से NJAC तक


1️⃣ शंकरि प्रसाद मामला (1951)

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है।


2️⃣ गोलकनाथ मामला (1967)

इस निर्णय में कहा गया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। इससे संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई।

परिणाम: संवैधानिक गतिरोध (Constitutional Deadlock)

 3️⃣ केशवानंद भारती मामला (1973)

सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य मार्ग अपनाया —

  • संसद संशोधन कर सकती है।
  • परंतु संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

📚 4️⃣ मिनर्वा मिल्स मामला (1980)

इस निर्णय में न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि संसद की संशोधन शक्ति सीमित है। मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।


⚖ 5️⃣ NJAC मामला (2015)

99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित किया गया क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती थी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मूल संरचना का हिस्सा माना गया।


 न्यायिक सिद्धांत का महत्व

  • संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करना
  • बहुमत के दुरुपयोग को रोकना
  • लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा
  • न्यायिक समीक्षा को मजबूत करना

✍ Mains उत्तर संरचना

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
  • प्रमुख मामलों का उल्लेख
  • मूल संरचना सिद्धांत का विकास
  • समकालीन महत्व
  • निष्कर्ष – संवैधानिक संतुलन

© Shaktimatha Learning | विशेष विषय – न्यायिक विकास श्रृंखला

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