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Friday, 20 February 2026

 

केशवानंद भारती मामला (1973)

मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना


प्रस्तावना

1973 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया केशवानंद भारती निर्णय भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। इसी मामले में “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) की स्थापना हुई।


 पृष्ठभूमि

यह मामला केरल सरकार के भूमि सुधार कानूनों से जुड़ा था। प्रमुख प्रश्न यह था कि क्या संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में असीमित संशोधन कर सकती है?

मुख्य प्रश्न: क्या संसद की संशोधन शक्ति असीमित है?

 13 न्यायाधीशों की पीठ

यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे बड़ी 13-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा सुना गया। निर्णय 7–6 के बहुमत से दिया गया।


 निर्णय का सार

  • संसद संविधान में संशोधन कर सकती है।
  • लेकिन संविधान की “मूल संरचना” को नष्ट नहीं कर सकती।

📚 मूल संरचना के तत्व

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • लोकतांत्रिक गणराज्य
  • संघवाद
  • धर्मनिरपेक्षता
  • न्यायिक समीक्षा
  • शक्तियों का पृथक्करण

🎯 महत्व

यह निर्णय संसद की शक्ति पर संवैधानिक सीमा निर्धारित करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है।


© Shaktimatha Learning | विशेष विषय – केशवानंद भारती मामला

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